World Photography Day: गांधी जी की 1946 की वह तस्वीर कैसे बनी भारतीय करेंसी की पहचान?

Kanpur Nagar

World Photography Day: गांधी जी की वह मुस्कुराती तस्वीर जो बनी भारतीय करेंसी की पहचान, जानिए इसके पीछे की दिलचस्प कहानी

Aug 20, 2026
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नई दिल्ली। हर साल 19 अगस्त को विश्व फोटोग्राफी दिवस (World Photography Day) मनाया जाता है। यह दिन फोटोग्राफी की उस ताकत को समर्पित है, जो किसी एक पल को कैमरे में कैद कर उसे दशकों और सदियों तक जीवित रख सकती है। दुनिया के इतिहास में ऐसी असंख्य तस्वीरें हैं, जिन्होंने अपने समय की कहानी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाई। भारत में ऐसी ही एक बेहद खास तस्वीर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की है, जिसका चित्र आज भारतीय करेंसी नोटों की पहचान बन चुका है।

भारतीय नोटों पर दिखाई देने वाली गांधी जी की मुस्कुराती तस्वीर महज एक चित्र नहीं है। इसका संबंध स्वतंत्रता से ठीक पहले के दौर से जुड़ी एक तस्वीर से है। गांधी जी के मूल चित्र से तैयार किया गया उनका पोर्ट्रेट बाद में भारतीय मुद्रा की महात्मा गांधी सीरीज का प्रमुख हिस्सा बना।

1946 की तस्वीर से जुड़ी है करेंसी पर दिखने वाली गांधी जी की छवि

प्रचलित ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, भारतीय करेंसी पर इस्तेमाल किए गए गांधी जी के पोर्ट्रेट का स्रोत 1946 में खींची गई एक तस्वीर है।

यह तस्वीर उस समय की बताई जाती है जब महात्मा गांधी ब्रिटिश राजनीतिज्ञ लॉर्ड फ्रेडरिक विलियम पेथिक-लॉरेंस के साथ थे। पेथिक-लॉरेंस तत्कालीन ब्रिटिश सरकार में भारत मामलों से जुड़े प्रमुख नेता थे और भारत के राजनीतिक भविष्य को लेकर चल रही महत्वपूर्ण गतिविधियों से जुड़े हुए थे।

इसी दौरान गांधी जी की एक सहज मुस्कान कैमरे में कैद हुई। आगे चलकर इसी तस्वीर से गांधी जी के चेहरे का पोर्ट्रेट लेकर भारतीय करेंसी के लिए अनुकूलित किया गया।

पूरी तस्वीर नहीं, गांधी जी का पोर्ट्रेट हुआ इस्तेमाल

भारतीय नोटों पर मूल तस्वीर को ज्यों का त्यों नहीं छापा गया। मूल फोटो में मौजूद गांधी जी की छवि से उनका चेहरा और पोर्ट्रेट लिया गया और उसे करेंसी नोट की डिजाइन के अनुरूप तैयार किया गया।

यही कारण है कि आज भारतीय नोट पर दिखाई देने वाली गांधी जी की तस्वीर किसी पेंटिंग या काल्पनिक चित्र की तरह नहीं, बल्कि वास्तविक फोटो पर आधारित पोर्ट्रेट है।

समय के साथ यह मुस्कुराता चेहरा भारतीय मुद्रा की सबसे आसानी से पहचानी जाने वाली विशेषताओं में से एक बन गया।

1996 में शुरू हुई ‘महात्मा गांधी सीरीज’

भारतीय रिजर्व बैंक ने 1996 में महात्मा गांधी सीरीज के बैंक नोट जारी करना शुरू किया। इस सीरीज में गांधी जी के पोर्ट्रेट को प्रमुख स्थान दिया गया।

इसके बाद अलग-अलग मूल्यवर्ग के नोटों पर महात्मा गांधी का चित्र भारतीय मुद्रा की स्थायी पहचान बनता चला गया।

बाद में भारतीय मुद्रा की डिजाइन और सुरक्षा विशेषताओं में कई बदलाव किए गए। 2016 में महात्मा गांधी (नई) सीरीज के नोट भी जारी किए गए, लेकिन गांधी जी का पोर्ट्रेट भारतीय बैंक नोटों की केंद्रीय पहचान बना रहा।

कुछ सेकंड की मुस्कान बन गई करोड़ों भारतीयों की रोजमर्रा की पहचान

1946 में जब यह तस्वीर ली गई होगी, उस समय शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि कैमरे में कैद हुआ यह सहज पल भविष्य में भारत के करोड़ों लोगों के दैनिक जीवन का हिस्सा बन जाएगा।

आज लेन-देन के दौरान भारतीय करेंसी हाथ में आते ही उस पर मौजूद गांधी जी का चेहरा तुरंत पहचाना जाता है।

इस तरह एक ऐतिहासिक तस्वीर ने फोटोग्राफी से निकलकर मुद्रा, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय दृश्य पहचान तक की लंबी यात्रा तय की।

तस्वीर किसने खींची? दिलचस्प है यह सवाल

इस ऐतिहासिक तस्वीर के फोटोग्राफर की पहचान को लेकर अलग-अलग विवरण मिलते रहे हैं और इसका श्रेय व्यापक रूप से किसी एक नाम के साथ स्थापित नहीं है।

यही इस तस्वीर की कहानी को और दिलचस्प बनाता है। तस्वीर स्वयं दुनिया भर में पहचानी जाने वाली भारतीय छवि का आधार बन गई, लेकिन कैमरे के पीछे मौजूद व्यक्ति का नाम आम लोगों के बीच लगभग अज्ञात रहा।

ऐसे में फोटोग्राफर की पहचान को लेकर अपुष्ट दावों के बजाय उपलब्ध आधिकारिक ऐतिहासिक रिकॉर्ड को प्राथमिकता देना उचित है।

फोटोग्राफी की ताकत का बेहतरीन उदाहरण

विश्व फोटोग्राफी दिवस हमें याद दिलाता है कि तस्वीर सिर्फ किसी व्यक्ति या स्थान की छवि नहीं होती। कई बार कैमरे का एक क्लिक अपने भीतर पूरा इतिहास, समय, भावना और सामाजिक संदर्भ समेट लेता है।

महात्मा गांधी की यह तस्वीर इसका बेहतरीन उदाहरण है। एक सामान्य मुलाकात के दौरान कैमरे में कैद हुई सहज मुस्कान आगे चलकर ऐसी पहचान बनी, जिसे आज भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भारतीय मुद्रा के साथ पहचाना जाता है।

विश्व फोटोग्राफी दिवस पर गांधी जी की इस ऐतिहासिक तस्वीर की कहानी यही संदेश देती है—कैमरा कभी-कभी एक क्षण को नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इतिहास को सुरक्षित कर देता है।

Rahul Dwivedi
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Rahul Dwivedi
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