आगरा। चोरी वर्ष 2004 में हुई, लेकिन पुलिस ने उसी चोरी से बरामद बताकर अदालत में जो सामान पेश किया, उसमें कुछ उत्पादों की निर्माण तिथि 2005 और 2006 की निकली। यानी कथित चोरी के एक-दो साल बाद बने सामान को 2004 की वारदात से जोड़ दिया गया। आगरा के एक पुराने चोरी के मुकदमे में सामने आए इस विरोधाभास ने पुलिस की जांच और कथित बरामदगी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य के अभाव में अदालत ने करीब 21 साल बाद आरोपी हन्नो को बरी करने का आदेश दिया।
मामले में अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम विनीता सिंह की अदालत ने थाना खेरागढ़ क्षेत्र के गांव छोटी पहाड़ी निवासी हन्नो को राहत दी। मुकदमे के दौरान बचाव पक्ष ने सामान पर दर्ज निर्माण वर्ष को प्रमुखता से उठाया, जिसने अभियोजन की कहानी पर ही सवाल खड़ा कर दिया।
19 अक्टूबर 2004 की रात जनरल स्टोर में हुई थी चोरी
मामला आगरा के जगदीशपुरा थाना क्षेत्र का है। दर्ज प्राथमिकी के मुताबिक, अवधेश कुमार गुप्ता ने पुलिस को तहरीर देकर बताया था कि 19 अक्टूबर 2004 की देर रात अज्ञात चोर उनकी जनरल स्टोर की दुकान के ताले तोड़कर अंदर घुस गए।
आरोप था कि चोर दुकान से घी, रिफाइंड, सिगरेट के पैकेट, पान मसाला, फेस क्रीम, चायपत्ती, डालडा, पेस्ट समेत बड़ी मात्रा में सामान और नकदी चोरी कर ले गए।
एक महीने बाद पुलिस ने पांच लोगों को पकड़ा
मामले की जांच के दौरान पुलिस ने 23 नवंबर 2004 को पथौली स्टेशन के पास दबिश दी। पुलिस ने हन्नो, शरीफ, रामकिशोर, संजय उर्फ निजामुद्दीन और महिला आरोपी राजकुमारी को हिरासत में लिया।
पुलिस ने आरोपियों से चोरी का सामान बरामद करने का दावा किया और बरामदगी की सूची भी मुकदमे में पेश की। लेकिन वर्षों बाद अदालत में इसी बरामद माल की तारीखों ने पुलिस की कहानी पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया।
सबसे बड़ा सवाल: 2004 की चोरी में 2006 का डालडा कैसे बरामद हुआ?
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने कथित बरामदगी में एक महत्वपूर्ण विरोधाभास अदालत के सामने रखा।
बचाव पक्ष के मुताबिक, जिस दुकान में चोरी अक्टूबर 2004 में हुई थी, उसी चोरी का माल बताकर पेश किए गए कोलगेट पेस्ट और साबुन आदि पर वर्ष 2005 की निर्माण तिथि दर्ज थी। इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह रही कि कथित तौर पर बरामद डालडा पर वर्ष 2006 की निर्माण तिथि दर्ज होने की बात सामने आई।
इससे स्वाभाविक सवाल उठा—जो उत्पाद चोरी की तारीख तक बना ही नहीं था, वह 2004 में दुकान से चोरी होकर नवंबर 2004 में आरोपी से बरामद कैसे हो सकता था?
यही तथ्य अभियोजन की कथित बरामदगी की विश्वसनीयता के लिए बड़ी चुनौती बन गया।
21 साल चले मुकदमे में सिर्फ दो गवाह पहुंचे
मामले की न्यायिक प्रक्रिया भी लंबी चली। करीब 21 वर्षों तक चले मुकदमे के दौरान अभियोजन की ओर से वादी और एक पुलिसकर्मी समेत केवल दो गवाहों के अदालत में गवाही देने की जानकारी सामने आई है।
इस बीच आरोपी शरीफ की मृत्यु हो गई। अन्य आरोपियों की पत्रावली अलग होने के कारण हन्नो के खिलाफ अलग से विचारण आगे बढ़ा।
अदालत में टिक नहीं सकी अभियोजन की कहानी
मुकदमे में कथित बरामद सामान की निर्माण तिथियों में अंतर और पर्याप्त साक्ष्य के अभाव ने अभियोजन पक्ष के मामले को कमजोर किया। आखिरकार अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर हन्नो को आरोपों से बरी करने का आदेश दिया।
यह मामला सिर्फ एक आरोपी के 21 साल बाद बरी होने तक सीमित नहीं है। 2004 की चोरी में 2005 और 2006 में निर्मित सामान की कथित बरामदगी पुलिस विवेचना, माल की पहचान और बरामदगी की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल छोड़ती है।