छावनी। आंखों में रोशनी नहीं है, लेकिन हाथों का स्पर्श ऐसा कि मिट्टी छूते ही उसमें प्रतिमा का आकार उभरने लगता है। जन्म से दृष्टिहीन रामपाल इन दिनों छावनी क्षेत्र के बबुरहवा चौराहे पर भगवान गणेश और मां दुर्गा की प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं। बिना देखे मिट्टी को बारीकी से आकार देने का उनका हुनर राहगीरों को भी ठिठककर देखने पर मजबूर कर देता है।
गणेश उत्सव और नवरात्रि से पहले रामपाल अपने परिवार के साथ प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। उनके लिए मूर्तिकला केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर होकर जीवन जीने का रास्ता भी है।
दो साल की उम्र में पिता ने हाथों में थमाई थी मिट्टी
पश्चिम बंगाल के शांतिपुर क्षेत्र के निकुंजनगर निवासी रामपाल बताते हैं कि उनके पिता विनय कृष्णपाल के तीन बेटे हैं और तीनों जन्म से दृष्टिहीन हैं। बच्चों की स्थिति ने पिता को परेशान जरूर किया, लेकिन उन्होंने परिस्थितियों के सामने हार नहीं मानी।
रामपाल जब करीब दो साल के थे, तभी पिता ने उनके हाथों में मिट्टी देकर मूर्तिकला से परिचय कराना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे यही मिट्टी उनके जीवन का सबसे बड़ा हुनर बन गई।
दस साल की मेहनत के बाद सीखी मूर्तिकला
रामपाल के मुताबिक मूर्तिकला को पूरी तरह सीखने में उन्हें करीब 10 साल लगे। शुरुआत बांस की पट्टियां काटने और उन्हें जोड़ने से हुई। इसके बाद घास से प्रतिमा का ढांचा तैयार करना, उस पर मिट्टी चढ़ाना और फिर चेहरे व दूसरे अंगों को बारीकी से आकार देना सीखा।
सीखने के दौरान पिता की सख्ती और अनुशासन ने उनके हुनर को निखारा। वर्षों के अभ्यास के बाद आज उनकी उंगलियां प्रतिमा की बनावट और मिट्टी की जरूरत को स्पर्श से पहचान लेती हैं।
स्पर्श ही करता है आंखों का काम
रामपाल मिट्टी को हाथों से महसूस करके तय करते हैं कि किस हिस्से पर कितना दबाव देना है और कहां कितना आकार उभारना है। प्रतिमा का चेहरा हो या पूरा ढांचा, उनके लिए हाथों का स्पर्श ही आंखों की भूमिका निभाता है।
लंबे अभ्यास के कारण वह प्रतिमा के अलग-अलग हिस्सों को छूकर उनकी बनावट समझ लेते हैं और फिर उसी अनुसार मिट्टी को आकार देते हैं।
पूरा परिवार मिलकर तैयार करता है प्रतिमाएं
इस काम में रामपाल अकेले नहीं हैं। उनकी पत्नी कंचना पाल, बेटे सौरभ और बहू रीमा भी प्रतिमाएं तैयार करने में उनका साथ देते हैं। परिवार के सदस्य अलग-अलग काम संभालते हैं और त्योहारों से पहले सभी मिलकर प्रतिमाओं को अंतिम रूप देते हैं।
रामपाल के मुताबिक इस बार गणेश उत्सव के लिए करीब आधा दर्जन प्रतिमाएं तैयार की गई हैं। इनमें चार प्रतिमाओं की बुकिंग हो चुकी है, जबकि दो अभी उपलब्ध हैं।
खेत की मिट्टी और हर्बल रंगों से बनाते हैं प्रतिमाएं
रामपाल प्रतिमाएं तैयार करते समय पर्यावरण का भी ध्यान रखने की बात कहते हैं। उनके मुताबिक वह प्लास्टर ऑफ पेरिस के बजाय खेत की मिट्टी का इस्तेमाल करते हैं और रंगाई में हर्बल रंगों को प्राथमिकता देते हैं।
उनका कहना है कि मिट्टी से बनी प्रतिमाएं विसर्जन के बाद पानी में आसानी से घुल जाती हैं, जिससे पर्यावरण पर अपेक्षाकृत कम असर पड़ता है।
मुश्किल को हुनर से दी मात
जन्म से दृष्टिहीन होने के बावजूद रामपाल ने अपनी परिस्थितियों को आत्मनिर्भर बनने के रास्ते की बाधा नहीं बनने दिया। जिस प्रतिमा को दूसरे कलाकार आंखों से देखकर आकार देते हैं, रामपाल उसकी बनावट को अपनी उंगलियों के स्पर्श से महसूस करते हैं।
त्योहारों की चहल-पहल के बीच उनकी कहानी केवल एक मूर्तिकार की नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत, अभ्यास और हुनर के सहारे आत्मनिर्भर बने कलाकार की कहानी है।