बिजनौर। जिले में गन्ने के खेतों और आबादी के आसपास गुलदारों की बढ़ती मौजूदगी वन विभाग और ग्रामीणों के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। पिछले करीब चार वर्षों में गुलदार के हमलों में बड़ी संख्या में लोगों की जान जा चुकी है, जबकि जिले के आठ ब्लॉक के करीब 190 गांव संवेदनशील श्रेणी में बताए गए हैं।
वन विभाग और स्थानीय स्तर पर किए गए आकलनों में गुलदारों की संख्या को लेकर अलग-अलग अनुमान सामने आए हैं। हालिया रिपोर्टों में जिले में 500 से अधिक गुलदार होने का विभागीय अनुमान सामने आया है, जबकि पूर्व के स्थानीय आकलनों में संख्या इससे काफी अधिक होने की आशंका जताई गई थी। फिलहाल सटीक संख्या के लिए वैज्ञानिक सर्वे को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जंगल से गन्ने के खेतों तक बढ़ी मौजूदगी
एक समय बिजनौर में गुलदारों की मौजूदगी मुख्य रूप से अमानगढ़ और नगीना-बढ़ापुर क्षेत्र के जंगलों के आसपास मानी जाती थी। समय के साथ गन्ने के खेतों में उनकी मौजूदगी बढ़ती गई।
वन्यजीवों पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों और विभागीय अधिकारियों के सामने अब बड़ी चुनौती ऐसे गुलदार हैं, जो लंबे समय से कृषि क्षेत्रों और आबादी के आसपास रह रहे हैं। गन्ने की घनी फसल उन्हें छिपने के लिए अनुकूल जगह उपलब्ध कराती है।
190 गांव संवेदनशील श्रेणी में
जिले में गुलदार प्रभावित क्षेत्रों का दायरा लगातार बढ़ा है। वन विभाग से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक जिले के आठ ब्लॉक के करीब 190 गांव गुलदार की गतिविधियों को लेकर संवेदनशील माने गए हैं।
कुछ वर्ष पहले तक संवेदनशील गांवों की संख्या काफी कम थी। अब खेतों के साथ आबादी के आसपास भी गुलदार दिखाई देने की घटनाएं सामने आ रही हैं।
चार वर्षों में दर्जनों लोगों की मौत
गुलदारों के हमलों में पिछले कुछ वर्षों के दौरान दर्जनों लोगों की जान जा चुकी है। अगस्त 2026 तक प्रकाशित विभागीय आंकड़ों में 2023 से अब तक 38 से अधिक मौतों का उल्लेख मिलता है।
इसके बावजूद हमलों की घटनाएं सामने आने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में चिंता बनी हुई है। खेतों में काम करने वाले किसान और मजदूर विशेष रूप से सतर्कता बरत रहे हैं।
बड़ी संख्या में लगाए गए पिंजरे
वन विभाग गुलदारों को पकड़ने के लिए प्रभावित क्षेत्रों में लगातार पिंजरे लगा रहा है। वर्ष 2026 में भी बड़ी संख्या में गुलदार पिंजरों में पकड़े जा चुके हैं।
इसके बावजूद कई इलाकों से लगातार गुलदार दिखाई देने की सूचनाएं मिल रही हैं। हाल के दिनों में भी अलग-अलग गांवों में पिंजरों में गुलदार पकड़े गए हैं।
व्यवहार में बदलाव पर विशेषज्ञों की नजर
बिजनौर में गुलदारों के व्यवहार को लेकर भी अध्ययन किया जा रहा है। कृषि क्षेत्रों में लंबे समय से रहने, आबादी के करीब आवाजाही और गन्ने के खेतों में शावकों की मौजूदगी जैसे पहलुओं को समझने की कोशिश की जा रही है।
हालांकि यह कहना कि गुलदारों की नई पीढ़ी का व्यवहार पूरी तरह बदल चुका है और इसी कारण इंसानों पर हमले बढ़े हैं, वैज्ञानिक सर्वे के निष्कर्ष आने से पहले निश्चित रूप से स्थापित नहीं किया जा सकता।
वैज्ञानिक सर्वे से तस्वीर स्पष्ट होने की उम्मीद
गुलदारों की वास्तविक संख्या, उनके आवास, आवाजाही और मानव-वन्यजीव संघर्ष को समझने के लिए वैज्ञानिक अध्ययन महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
वन विभाग को उम्मीद है कि सर्वे से मिलने वाले आंकड़ों के आधार पर प्रभावित क्षेत्रों के लिए अधिक प्रभावी रणनीति तैयार करने में मदद मिलेगी।
ग्रामीणों से सतर्क रहने की अपील
वन विभाग प्रभावित क्षेत्रों के लोगों से खेतों में विशेष सावधानी बरतने की अपील कर रहा है। गुलदार प्रभावित क्षेत्रों में अकेले जाने से बचने और बच्चों को खेतों के आसपास अकेला नहीं भेजने की सलाह दी गई है।
वन विभाग के लिए फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती गुलदारों को सुरक्षित तरीके से नियंत्रित करने के साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष और हमलों को रोकना है।