देवली में धर्मसभा को किया संबोधित; बोले- मिथ्यात्व संसार में भ्रमण का प्रमुख कारण, राग-द्वेष से रहित परिणामों से मिलती है सद्गति
देवली। मुनिश्री सुप्रभ सागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि धर्म और सम्यक् परिणाम के माध्यम से मनुष्य देव पर्याय को प्राप्त कर सकता है, जबकि पाप और अशुभ परिणामों के कारण देव भी तिर्यंच पर्याय को प्राप्त हो सकता है। इसलिए जीवन में सच्चे देव, शास्त्र और गुरु के प्रति श्रद्धा रखना आवश्यक है।
मुनिश्री ने कहा कि संक्लेश परिणामों और विषय-भोग में लिप्त रहने के कारण जीव निम्न गति को प्राप्त कर सकता है। वहीं सच्चे देव-शास्त्र-गुरु के प्रति श्रद्धा और राग-द्वेष से रहित परिणाम व्यक्ति को सद्गति की ओर ले जाते हैं।
‘मिथ्यात्व के कारण हित-अहित का निर्णय नहीं कर पाता व्यक्ति’
मुनिश्री सुप्रभ सागर ने कहा कि संसार में जीव के भ्रमण का प्रमुख कारण मिथ्यात्व है। मिथ्यात्व के कारण व्यक्ति अपने कर्मों और उनके परिणामों में हित-अहित का सही निर्णय नहीं कर पाता।
उन्होंने जीवन में सम्यक् श्रद्धा और विवेक के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि आत्मकल्याण के लिए सही मार्ग की पहचान करना आवश्यक है।
शरीर की तरह आत्मा को भी उपचार की जरूरत
मुनिश्री ने कहा कि सांसारी प्राणी जन्म, जरा, मृत्यु, क्षुधा और रोग जैसी अवस्थाओं से अनादिकाल से गुजरता आया है। जिस प्रकार शरीर में रोग होने पर व्यक्ति अच्छे चिकित्सक की तलाश करता है, उसी प्रकार आत्मा के विकारों को दूर करने के लिए भी उचित मार्गदर्शन आवश्यक है।
उन्होंने कहा, “जिस प्रकार शरीर का उपचार योग्य चिकित्सक से कराया जाता है, उसी प्रकार आत्मा का उपचार सच्चे देव-शास्त्र-गुरु के मार्गदर्शन में होना चाहिए।”
तत्काल परिणाम के बजाय स्थायी समाधान पर दें ध्यान
मुनिश्री ने कहा कि आज व्यक्ति किसी समस्या या रोग का तत्काल समाधान चाहता है, लेकिन कई बार उसके दूसरे प्रभावों पर ध्यान नहीं देता। उन्होंने इसी उदाहरण के माध्यम से आध्यात्मिक जीवन में सही मार्गदर्शन की आवश्यकता समझाई।
मुनिश्री सुप्रभ सागर ने कहा कि मिथ्या देव-शास्त्र-गुरु का मार्ग तत्काल प्रभावकारी दिखाई दे सकता है, लेकिन उसके परिणाम बाद में सामने आते हैं। आत्मा का सही और स्थायी उपचार सच्चे देव-शास्त्र-गुरु की शरण और उनके मार्गदर्शन से ही संभव है।
रिपोर्ट: मुकेश कुमार जैन, देवली