देवली। मुनि श्री सुप्रभसागर जी महाराज ने धर्मसभा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए संतोष, संयम और आत्मचिंतन का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि भौतिक वस्तुओं के संग्रह की अंधी दौड़ व्यक्ति को वास्तविक सुख से दूर कर देती है। इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं होने से आकांक्षाएं लगातार बढ़ती जाती हैं और व्यक्ति सांसारिक आकर्षणों में उलझकर तनावग्रस्त हो जाता है।
सम्यक दृष्टि और ज्ञान से दूर होता है मोह
मुनिश्री ने कहा कि मोह रूपी अंधकार को दूर करने और राग-द्वेष से मुक्ति प्राप्त करने के लिए सम्यक दृष्टि एवं सम्यक ज्ञान को जीवन में अपनाना आवश्यक है। उन्होंने जैन दर्शन के संदर्भ में बताया कि मोहनीय कर्म आत्मा को संसार के बंधन में रखता है। इसके प्रभाव में व्यक्ति वास्तविक सुख को भूलकर बाहरी आकर्षणों के पीछे भागता रहता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को अपने भीतर के दोषों और विकारों को पहचानने तथा आत्मिक शुद्धता की दिशा में प्रयास करने के लिए प्रेरित किया।
संग्रह बढ़ने के साथ बढ़ती जाती हैं आकांक्षाएं
मुनि श्री सुप्रभसागर जी महाराज ने कहा कि जीवन में संतोष का महत्वपूर्ण स्थान है। संतोष के अभाव में व्यक्ति की इच्छाएं समाप्त नहीं होतीं। जितना भौतिक संग्रह बढ़ता है, उतनी ही अधिक संग्रह करने की प्रवृत्ति भी बढ़ती जाती है।
उनके अनुसार, वस्तुओं को प्राप्त करने की इस निरंतर दौड़ में व्यक्ति परिवार और समाज से अलग-थलग पड़ने लगता है। परिणामस्वरूप अकेलापन बढ़ता है और जीवन तनाव से घिर जाता है। उन्होंने संतोष तथा संयम के माध्यम से जीवन को सार्थक बनाने का संदेश दिया।
बाहरी उपायों से समाप्त नहीं होते आंतरिक विकार
मुनिश्री ने कहा कि व्यक्ति अक्सर अपने दोषों को छिपाने का प्रयास करता है, लेकिन केवल बाहरी उपायों से आंतरिक विकारों को समाप्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने शरीर की नश्वरता का उल्लेख करते हुए कहा कि उसकी सुरक्षा और उसे आकर्षक बनाए रखने के लिए अनेक प्रयास किए जाते हैं, फिर भी शरीर को स्थायी नहीं बनाया जा सकता।
उन्होंने श्रद्धालुओं से बाहरी दिखावे के बजाय आत्मा के शुद्ध स्वरूप को पहचानने और आत्मचिंतन पर ध्यान देने का आह्वान किया।
जन्म-मरण से मुक्ति को बताया वास्तविक लक्ष्य
भगवान की वीतराग अवस्था का उल्लेख करते हुए मुनिश्री ने कहा कि जैन दर्शन में जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति जीवन का वास्तविक लक्ष्य है। आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने के लिए मोह, राग-द्वेष और आसक्ति का त्याग आवश्यक है।
उन्होंने धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को संतोष, संयम और सम्यक दर्शन अपनाने की प्रेरणा दी। साथ ही सांसारिक आकर्षणों के पीछे भागने के बजाय आत्मिक सुख, मानसिक शांति और मोक्षमार्ग की साधना को जीवन का उद्देश्य बनाने का संदेश दिया।