आचार्य श्री विमल सागर जी महाराज की 111वीं जन्म जयंती मनाई गई

Neemuch

एटा: आचार्य विमल सागर जी की 111वीं जन्म जयंती पर भव्य धार्मिक आयोजन

Oct 4, 2026
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एटा की पुरानी बस्ती स्थित श्री दिगंबर जैन बड़े मंदिर जी में विमल सागर सेवा समिति के तत्वावधान में वात्सल्य रत्नाकर, सन्मार्ग दिवाकर आचार्य श्री विमल सागर जी महाराज की 111वीं जन्म जयंती श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई गई। इस अवसर पर धार्मिक अनुष्ठान, श्री विमल सागर विधान, गुरु भक्ति, आरती और विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए। बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं ने कार्यक्रम में शामिल होकर आचार्य श्री को विनयांजलि अर्पित की।

जन्म जयंती महोत्सव के अवसर पर आयोजित श्री विमल सागर विधान में इंद्र-इंद्राणियों ने मंत्रोच्चार के बीच मांडने पर अर्घ्य समर्पित किए। विमल सागर सेवा समिति के पदाधिकारियों ने आचार्य श्री के चित्र का अनावरण, दीप प्रज्वलन और पाद प्रक्षालन किया। वहीं गुरु विमल महिला परिवार की पदाधिकारियों ने आचार्य श्री को शास्त्र भेंट किया।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आचार्य श्री नयनसागर जी महाराज ने आचार्य श्री विमल सागर जी महाराज के जीवन, साधना और धार्मिक योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आचार्य श्री विमल सागर जी साधना के महाशिखर थे और प्रतिदिन रात्रि में पांच से छह घंटे तक मंत्र साधना करते थे। उनके अनुसार आचार्य श्री का जीवन कठोर तप, प्रभु भक्ति और तीर्थों के प्रति गहरी श्रद्धा से परिपूर्ण था।

आचार्य नयनसागर जी ने आचार्य श्री विमल सागर जी से जुड़ी आध्यात्मिक मान्यताओं का उल्लेख करते हुए उनके निमित्त ज्ञान और साधना के संबंध में भी श्रद्धालुओं को बताया। उन्होंने कहा कि आचार्य श्री ने अनेक तीर्थ यात्राएं कर जैन धर्म के सिद्धांतों और धार्मिक संदेशों के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। साधना से जुड़ी अलौकिक घटनाओं और शक्तियों संबंधी बातें धार्मिक आस्था एवं वक्ता के कथन के रूप में प्रस्तुत की गईं।

उन्होंने ‘सन्मार्ग दिवाकर’ उपाधि का अर्थ बताते हुए कहा कि इसका आशय सत्य और कल्याणकारी मार्ग को प्रकाशित करने वाले सूर्य से है। उनके अनुसार जिस प्रकार सूर्य अंधकार दूर कर प्रकाश फैलाता है, उसी प्रकार आचार्य श्री विमल सागर जी ने अपने ज्ञान, उपदेश और तपस्या के माध्यम से लोगों को धर्म और सन्मार्ग की प्रेरणा दी।

जैन महिला संगठन की अध्यक्ष बबिता जैन प्रेरणा ने आचार्य श्री विमल सागर जी के जीवन परिचय पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उनका जन्म एटा जनपद के जलेसर क्षेत्र स्थित ग्राम कोसमा में माता कटोरी देवी और पिता बिहारी लाल जी के यहां हुआ था। बचपन में उनका नाम नेमिचंद्र था। उन्होंने आगे चलकर वैराग्य धारण किया और दिगंबर श्रमण परंपरा को अपनाया।

उन्होंने बताया कि आचार्य श्री ने दिगंबर श्रमण परंपरा के 36 मूल गुणों का पालन करते हुए जैन धर्म के मूल सिद्धांतों के प्रचार-प्रसार और आत्मकल्याण एवं परकल्याण के उद्देश्य से अपना जीवन समर्पित किया। कार्यक्रम में दी गई जानकारी के अनुसार 29 दिसंबर 1994 को सम्मेद शिखर जी में उनकी समाधि हुई थी।

सायंकालीन सत्र में संगीतकार सुशील जैन एंड पार्टी के सान्निध्य में गुरु भक्ति और आरती का आयोजन किया गया। श्रद्धालुओं ने भक्ति प्रस्तुत कर आचार्य श्री के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की। इसके बाद विमल आराधना के अंतर्गत 111 लकी ड्रॉ कूपन के पुरस्कार विमल सागर सेवा समिति की ओर से प्रदान किए गए।

समस्त कार्यक्रम श्री दिगंबर जैन पद्मावती पुरवाल पंचायत के संरक्षण में आयोजित हुए। आयोजन में शैलेन्द्र जैन, सुबोध जैन अल्ला, सुनील जैन बांदा, पंकज जैन, रविन्द्र टीटू, अरुण अन्नू, दिलीप जैन, विवेक जैन, प्रशांत जैन, दीपमाला जैन, बबिता जैन, शिल्पी जैन, नेहा जैन, प्रियंका जैन, दीप्ति जैन सहित बड़ी संख्या में समाज के लोग मौजूद रहे।

Mukesh kumar Jain
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Mukesh kumar Jain
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