शादी, गृहप्रवेश और पूजा में दरवाजों की शोभा बनता है लाल अरता; कारीगर बोले- मशीन नहीं, बाजार की भी समस्या, बिचौलियों के सहारे बेचने की मजबूरी
हुलासगंज। शादी हो, गृहप्रवेश हो, सत्यनारायण पूजा हो या कोई अन्य मांगलिक कार्य... बिहार के कई ग्रामीण इलाकों में आज भी घर के मुख्य दरवाजे पर लाल रंग का छोटा सा गोल फाहा लगाने की परंपरा कायम है। स्थानीय बोलचाल में इसे ‘अरता’ कहा जाता है। शुभता और मंगलकामना का प्रतीक माना जाने वाला यह अरता घर की रौनक तो बढ़ाता है, लेकिन इसे बनाने वाले कई कारीगरों की जिंदगी आज भी आर्थिक तंगी से जूझ रही है।
हुलासगंज प्रखंड क्षेत्र के रोस्तमपुर गांव में करीब दो दर्जन परिवार आज भी पीढ़ियों से अरता, सिंदूर और अबीर बनाने के पुश्तैनी काम से जुड़े हैं। बदलते दौर में भी इन परिवारों ने अपनी परंपरागत कला को जीवित रखा है, लेकिन कारीगरों का कहना है कि इस श्रमप्रधान काम से होने वाली आमदनी परिवार की जरूरतों के मुकाबले काफी कम है।
सुबह से काम में जुट जाता है पूरा परिवार
रोस्तमपुर में अरता बनाने का काम एक तरह के कुटीर उद्योग के रूप में किया जाता है। परिवार के सदस्य सुबह से ही इसके निर्माण में जुट जाते हैं। अरता तैयार करने में कई चरणों से गुजरना पड़ता है और काफी मेहनत लगती है।
इस पुश्तैनी व्यवसाय से जुड़ी सबीता देवी, राजेश लाल और अयोध्या लाल ने बताया कि अरता बनाने के लिए अकवन के पौधे के फलों से निकलने वाली रूई का इस्तेमाल किया जाता है।
कारीगरों के अनुसार सफेद रूई करीब 100 रुपये प्रति किलो की दर से खरीदी जाती है। इसके बाद उसकी मशीन से धुनाई कराई जाती है और रूई को अरता का आकार दिया जाता है।
दो घंटे लाल रंग में खौलाने के बाद धूप में होता है तैयार
आकार देने के बाद अरता को लाल रंग में डालकर करीब दो घंटे तक खौलाया जाता है। ठंडा होने के बाद एक-एक अरता को अलग किया जाता है और फिर धूप में अच्छी तरह सुखाया जाता है।
पूरी तरह सूख जाने के बाद इनके बंडल तैयार किए जाते हैं और बिक्री के लिए बाजार भेजे जाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में काफी समय और श्रम लगता है, लेकिन कारीगरों के मुताबिक इसके मुकाबले उन्हें मिलने वाला आर्थिक लाभ बेहद सीमित है।
रूई की धुनाई कराने जाना पड़ता है इस्लामपुर
कारीगरों की सबसे बड़ी समस्याओं में आधुनिक मशीन का अभाव भी शामिल है। उनका कहना है कि रूई खरीदने के बाद उसकी मशीन से धुनाई कराने के लिए उन्हें इस्लामपुर जाना पड़ता है। इससे समय के साथ अतिरिक्त खर्च भी होता है।
कारीगरों का कहना है कि यदि सरकारी स्तर पर गांव में एक मशीन उपलब्ध करा दी जाए तो अरता बनाने वाले दो दर्जन से अधिक परिवारों को बड़ी राहत मिल सकती है।
उनका दावा है कि जीविका से जुड़े होने के बावजूद इस पारंपरिक व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें अपेक्षित सहायता नहीं मिल सकी है।
बाजार नहीं मिलने से बिचौलियों का सहारा
कारीगरों के सामने उत्पादन के साथ बिक्री भी बड़ी चुनौती है। स्थानीय स्तर पर बड़ा और व्यवस्थित बाजार नहीं होने के कारण उन्हें अपना सामान बेचने के लिए बिचौलियों का सहारा लेना पड़ता है।
कारीगरों का कहना है कि यदि उनके उत्पादों के लिए सीधे बाजार से जुड़ने की व्यवस्था हो, प्रशिक्षण मिले और आधुनिक मशीन उपलब्ध कराई जाए तो पुश्तैनी कारोबार से होने वाली आमदनी बढ़ सकती है।
लाल रंग ही क्यों? मंगल और सौभाग्य से जुड़ा है लोकविश्वास
अरता मुख्य रूप से लाल रंग में बनाया जाता है। इसके पीछे स्थानीय लोकपरंपराएं और मान्यताएं जुड़ी हैं। लोकमान्यता में लाल रंग को मंगल, सौभाग्य और शुभता का प्रतीक माना जाता है।
इसी कारण मांगलिक अवसरों पर लाल अरता लगाने की परंपरा चली आ रही है। शादी के अवसर पर इसे नवदंपती के सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार की समृद्धि की मंगलकामना से भी जोड़कर देखा जाता है।
मुख्य दरवाजे पर लगाने की वर्षों पुरानी परंपरा
घर का मुख्य दरवाजा प्रवेश का प्रमुख स्थान होता है। स्थानीय लोकविश्वास में अरता को मुख्य दरवाजे पर लगाना घर में शुभता और सकारात्मक वातावरण से जोड़कर देखा जाता है।
कुछ क्षेत्रों में इसे नजर अथवा अशुभ प्रभाव से बचाव के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। हालांकि इसे किसी प्रमाणित शास्त्रीय तथ्य के बजाय स्थानीय लोकविश्वास और सांस्कृतिक परंपरा के रूप में समझना अधिक उचित है।
छठ से लेकर शादी और गृहप्रवेश तक जुड़ी है परंपरा
बिहार की लोकसंस्कृति में अरता का प्रयोग अलग-अलग क्षेत्रों में विभिन्न अवसरों पर देखने को मिलता है। कुछ इलाकों में छठ पूजा के बाद अरता-पात को घर के दरवाजे पर लगाने की परंपरा भी प्रचलित बताई जाती है।
इसके अलावा शादी, गृहप्रवेश, सत्यनारायण पूजा और दूसरे मांगलिक आयोजनों में भी परिवार अपनी स्थानीय परंपराओं के अनुसार इसका इस्तेमाल करते हैं।
आधुनिक सजावटी वस्तुओं के बढ़ते चलन के बावजूद रोस्तमपुर के कारीगर पीढ़ियों से मिली इस कला को आज भी जीवित रखे हुए हैं। उनकी उम्मीद है कि यदि आधुनिक मशीन, बाजार और सरकारी योजनाओं का सहयोग मिले तो यह पुश्तैनी कुटीर उद्योग न केवल बच सकता है, बल्कि गांव के परिवारों के लिए बेहतर रोजगार का साधन भी बन सकता है।